History of the Arora Community — Origins & Heritage
Source: Dr. Om Prakash Chhabra ji — Aroravansh Itihas
अरोड़वंश के संस्थापक महाराज अरूट प्रभु श्रीराम की आठवीं पीढ़ी में जन्मे थे। वे सूर्यवंशी क्षत्रिय थे और कश्यप गोत्र से उनका बेहद खास नाता था।
भगवान् राम के पुत्र लव को लाहौर का राज्य उत्तराधिकार में मिला था। उनके कुल में कालराय नामक राजा हुए। उनकी दो रानियाँ थीं। एक रानी का पुत्र शांत स्वभाव का था, इसलिए उसे अरूट् (अक्रोधी) कहा जाता था। राजा ने मंत्री की राय से अरूट् को अपना सारा खजाना दे दिया तथा दूसरी रानी के पुत्र छोटे राजकुमार को राज्य का उत्तराधिकारी बना दिया।
बड़े राजकुमार अरूट् ने लाहौर नगर छोड़कर मुल्तान की ओर प्रस्थान किया। उसके साथ अनेक नागरिक और सैनिक भी चल पड़े। राजकुमार अरूट् ने अरूटकोट नामक नगर बसाया। अरूट् को स्थानीय भाषा में अरोड़ तथा नगर को अरोड़कोट कहा जाता था। राजकुमार अरोड़ के वंशज अरोड़ा कहलाए। अरोड़ा वंश पंजाब का समुदाय है।
अरोड़ शब्द की व्याख्या के अनुसार अरोड़ प्रांत के राजा या क्षत्रिय अरोड़ा कहलाए। "अरोड़ा" शब्द का अर्थ है — पाकिस्तान के सिंध प्रांत में सिंधु नदी के तट पर स्थित 'अरोड़' नामक प्राचीन शहर से संबंध रखने वाले। यह स्थान रोहरी तथा सुक्कुर के समीप स्थित था।
अरोड़ा खत्री समूह के समान ही होते हैं। दोनों समूह समान कार्यों में संलग्न हैं, इनका उच्चारण और भौतिक स्वरूप एक समान है, परंपराएँ और अनुष्ठान आदि भी समान ही होते हैं। दोनों समुदायों के बीच उपनाम तथा उपसमुदाय लगभग एक जैसे ही हैं। दोनों समुदाय एक-दूसरे के काफी निकट हैं और दोनों के बीच विवाह-संबंध भी होते हैं। अरोड़ा अपनी उत्पत्ति खत्री समाज से ही मानते हैं। ऐसा कहा जाता है कि खत्री, लाहौर और मुल्तान के खत्री हैं, तथा अरोड़ा — अरोड़ के खत्री ही हैं।
अरोड़ावंश के कुलदेवता पठानकोट, पंजाब में हैं। सालाना सावन की अमावस्या के बाद के 4 रविवार यहाँ भव्य मेला होता है। इतिहास-लेखक प्लिनी ने अरोड़ा वंशजों को "अरोटुरी" लिखा है। सिकंदर को भी महाराजा अरूट के वंशजों से लड़ना पड़ा था।
कालांतर में अरोड़ राज्य की गद्दी देवाजी ब्राह्मण के हाथ में आ गई। देवाजी ब्राह्मण के वंशज बौद्ध थे और उनकी राजधानी अलोर या अरोड़कोट ही थी, जिसे आजकल रोडी कहते हैं। अंतिम राजा दाहर के शासनकाल में अरब आक्रमणकारियों के कई हमले विफल किए गए, परंतु मुहम्मद बिन कासिम के आक्रमण में आपसी फूट के कारण अरोड़कोट हाथ से चला गया।
लाहौर विश्वविद्यालय के फारसी हस्तलिखित ग्रंथों से ज्ञात होता है कि अरोड़ सिंध की राजधानी थी। इतिहासकार टॉड के अनुसार अरोड़नगर वर्तमान रोडी नगर से पाँच मील पूर्व था और सिंधु नदी कभी इसी के नीचे बहती थी।
अरब आक्रमण के बाद अरोड़ा सिंधु नदी के किनारे उत्तर की ओर बढ़ते गए। तीन सौ वर्ष बाद पंजाब में पुनः आक्रमण होने पर सिंध लौटे और लोहावर / लोहाणे कहलाने लगे। आजकल भी लोहाणे के गीत लाहौर की ओर इशारा करते हैं। अरोड़वंशी स्वयं को काश्यप गोत्र के क्षत्रिय मानते हैं।
ग्यारहवीं शताब्दी में पंजाब पर विदेशी आक्रमण होने पर कुछ अरोड़वंशी राजस्थान की ओर चले गए। अनेक हस्तलिखित ग्रंथों से प्रमाण मिलते हैं कि वे पंजाब से होकर राजपूताने में बसे थे।
श्री पुष्कर राज में अरोड़वंशी खत्रियों द्वारा बनवाया हुआ श्री दरियाब देव जी का मंदिर विद्यमान है। जिन बड़े नगरों में अरोड़वंशी बिरादरी के घर अधिक हैं, वहाँ भी श्री दरियादेव जी के मंदिर स्थापित हैं। राजस्थान में 84 अल्ले हैं।
राजपूताना निवासी अरोड़वंशियों में उत्तराधी, दरबने, डाहरे आदि भेदों का कोई अलग समुदाय नहीं है। अधिकांश लोग इन भेदों से अनभिज्ञ भी हैं। लोगों के रीति-रिवाजों को देखने पर राजस्थान के अरोड़ा दरबने प्रतीत होते हैं। राजस्थान के अरोड़ों में ज्यादातर व्यापार में ही लगे हैं।
इस शताब्दी में एक विधवा के विवाह को लेकर फूट पड़ गई और पूरी बिरादरी दो दलों में बँट गई। यह दलबंदी अब भी देखने में आती है। एक दल जोधपुरी अरोड़ा खत्री तथा दूसरा नागौरी अरोड़ा खत्री कहलाता है।
सिंध के नसरपुर शहर में अरोड़वंशी ठक्कर भक्त रतन राय के घर संवत् 1007, चैत्र सूदी दूज, शुक्रवार, प्रात: 4 बजे श्री वरुण दरियाब देव (श्री झूलेलाल) साकार रूप में प्रकट हुए। उस समय सिंध में मराव नामक मुसलमान बादशाह का राज्य था। सिंध की राजधानी तब उटा नगर थी।
बादशाह को जब इस तेजस्वी बच्चे के जन्म की जानकारी मिली, तो उसने वजीर अह्या को नसरपुर भेजा। श्री अमर लाल जी ने पालने में ही जो चमत्कार दिखाए, उससे वह नतमस्तक हो गया। अह्या की प्रार्थना पर श्री अमर लाल ने नीले घोड़े पर युवक के रूप में जाकर बादशाह का अहंकार दूर किया। आज भी उडेरा लाल ग्राम में सुंदर विशाल मंदिर और क्षमायाचक मराव बादशाह का बनवाया किला मौजूद है।